दैन्य-माधुरी · पद 89
सुनु वंशीवारे साँवरे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sunu vanshīvāre sāṁvare
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनु वंशीवारे साँवरे।
2लख चौरासी योनि चराचर, चलत पिराने पाँव रे।
3यदपि मिली नर तनु सुर दुर्लभ, लागी भल यह दाँव रे।
4तदपि न तुम सन हेत करत मन, लेत न तुम्हरो नाँव रे।
5मृग मृगजल ज्यों प्यास बुझत नहिं, धोखा है सब ठाँव रे।
6अब कृपालु अपनाव"कृपालुहिं", देहु वास नँदगाँव रे॥
हिन्दी भावार्थ
हे मुरली मनोहर श्यामसुन्दर! हमारी भी सुन लो। जड़ चेतनात्मक चौरासी लाख योनियों में भटकते-भरकते हमारे पाँव थक गये। यद्यपि देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानव देह हमें मिली। बड़ा अच्छा अवसर है। किन्तु यह मूढ़ मन न तुम्हारा नाम लेता है और न तुमसे प्रेम ही करता है। जैसे हिरन की प्यास मरुस्थल में उड़ते हुए बालू के कणों पर सूर्य रश्मियों के पड़ने से भ्रमबश दीखने वाले जल से नहीं बुझती उसी प्रकार सांसारिक पदार्थो के विषयों से इन्द्रिय मन आदि को तृप्ति नहीं होती। हे कृपासिन्धु!! अब 'कृपालु'को अपना बनाकर नन्दग्राम का वासी बना दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 244