दैन्य-माधुरी · पद 88
श्याम हौं कब ह्वैहौँ ब्रजधूरि।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: shyāma hauṁ kaba hvaihauṁ brajadhūri
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1श्याम हौं कब ह्वैहौँ ब्रजधूरि।
2ह्वै ब्रजधूरि अंग लपटैहौं, उर आनँद भरपूरि।
3जेहि ब्रजरज कहँ रसिकन मानत, प्रान सजीवन मूरि।
4जेहि पावन रज पावन कहँ विधि, भाग मनावत भूरि।
5जेहि लगि बने लतन तरु ज्ञानिन, त्यागि समाधिन दूरि।
6धूरि धूसरित तोहिं “कृपालु” कब, अतनु लखैगो घूरि॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मैं कब ब्रज-धूलि बनूँगा? एव ब्रज-धूलि बनकर, आनन्द-विभोर होकर तुम्हारे अंग-अंग कब लिपटूँगा? जिस ब्रज-धूलि को रसिक लोग प्राण संजीवन मानते हैं, जिस पवित्र धूलि को पाने के लिए ब्रह्मा भिखारी ब कर अपने भाग्य की सराहना करता है, जिस ब्रज-धूलि क पाने के लिए परमहँस लोग अपनी समाधि को छोड़कर लताः वृक्ष बने हुए हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि वह दिन कब आयेग जब मैं वह धूलि बनकर तुम्हें धूलि-धूसरित करूंगा एवं तुम्हा शरीर को शंकर जी का शरीर समझकर कामदेव तुम्हारी ओर घूर कर देखेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 243-244