# सुनो हरि अधम उधारन हार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0241-M04-K090
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 90
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 108–108

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>सुनो हरि अधम उधारन हार।  
<a id="line-2"></a>तुम्हरे सब चाकर हैं नागर, गुन आगर सरकार।  
<a id="line-3"></a>पै इक निगुनी बिनु नहिं शोभा, होति गुनिन दरबार।  
<a id="line-4"></a>ज्यों न होत मायिक दुख तो तोहिं, को पूछत संसार।  
<a id="line-5"></a>त्यों न होय जो मो सम निगुनी, हो न गुनिन सत्कार।  
<a id="line-6"></a>जानत जग “कृपालु” है तुम्हरो, अपनो जानि निहार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे अधमों को अपजाने वाले श्यामसुन्दर! एक प्रार्थना हमारी भी सुन लो। हे नाथ! तुम्हारे समस्त दास समस्त गुणों के भण्डार एवं रसिक हैं। लेकिन किसी भी दरबार में बिना एक गुणहीन व्यक्ति के गुणी लोगों की शोभा नहीं हैं! जिस प्रकार यदि संसार में मायिक दुःख न होता तो आनन्दस्वरूप तुम को कौन पूछता? उसी प्रकार मुझ सरीखे अवगुण के भण्डार यदि तुम्हारे दरबार में न होंगे तो सर्वगुणसंपन्न तुम्हारे समस्त भक्तों का सम्मान क्या रह जायगा? 'कृपालु' कहते हैं-हे श्यामसुन्दर! भ्रमवश सारा संसार मुझे तुम्हारा भक्त जानता है, तुम भी एक बार अपना जानकर मेरी ओर देख लो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 244-245

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
