दैन्य-माधुरी · पद 79
राधे मोहिं, चरण कमल रज कीजै।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rādhe! mohiṁ, charaṇa-kamala-raja kījai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1राधे मोहिं, चरण कमल रज कीजै।
2तुव मानिनि हित पिय दृग-जल सों, जा पदरज नित भीजै।
3जा पावन पदरज पावन को, कमलाहू कर मीजै।
4जेहि लगि विधि वरदान माँगि कह, नाथ! सोइ रज दीजै।
5बिनु कारण करुणाकारिणि तुम, मम पुकार सुनि लीजै।
6अंध “कृपालु” पाय दृग जब ही, तब ही सही पतीजै॥
हिन्दी भावार्थ
हे रसिकनजीवनमूर्ति राधिके! मुझे अपने युगल-चरण कमलों की धूलि बना दीजिए। तुम जब मान करोगी तथा श्यामसुन्दर तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर रोते हुए मनाने जायेंगे, तब मैं चरणधूलि बनी हुई प्रियतम के आँसुओं से भीगा करूँगी। जिस पवित्र चरण धूलि के लिए महालक्ष्मी करोड़ों कल्प तप करके भी लालायित रहती हैं, एवं हाथ मींजती रहती हैं। जिस चरण धूलि के लिए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा वरदान माँगकर बड़भागी बनते हैं, वही तुम्हारी चरण धूलि मैं भी बनना चाहती हूँ। तुम अकारण ही दया करने वाली हो, अतएव मेरी इस पुकार को अवश्य ही सुन लो। 'कृपालु' कहते हैं कि 'अंधा जब आँख पाय तब पतियाय' इस लोकोक्ति के अनुसार जब तुम मेरी पुकार सुन लोगी एवं मुझे अपने चरणों की धूल बना लोगी, तब ही मुझे तुम्हारे अकारण-करुण नाम पर विश्वास होगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 237