# राधे मोहिं, चरण कमल रज कीजै।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0230-M04-K079
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 79
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 104–104

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>राधे मोहिं, चरण कमल रज कीजै।  
<a id="line-2"></a>तुव मानिनि हित पिय दृग-जल सों, जा पदरज नित भीजै।  
<a id="line-3"></a>जा पावन पदरज पावन को, कमलाहू कर मीजै।  
<a id="line-4"></a>जेहि लगि विधि वरदान माँगि कह, नाथ! सोइ रज दीजै।  
<a id="line-5"></a>बिनु कारण करुणाकारिणि तुम, मम पुकार सुनि लीजै।  
<a id="line-6"></a>अंध “कृपालु” पाय दृग जब ही, तब ही सही पतीजै॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे रसिकनजीवनमूर्ति राधिके! मुझे अपने युगल-चरण कमलों की धूलि बना दीजिए। तुम जब मान करोगी तथा श्यामसुन्दर तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर रोते हुए मनाने जायेंगे, तब मैं चरणधूलि बनी हुई प्रियतम के आँसुओं से भीगा करूँगी। जिस पवित्र चरण धूलि के लिए महालक्ष्मी करोड़ों कल्प तप करके भी लालायित रहती हैं, एवं हाथ मींजती रहती हैं। जिस चरण धूलि के लिए सृष्टिकर्ता ब्रह्मा वरदान माँगकर बड़भागी बनते हैं, वही तुम्हारी चरण धूलि मैं भी बनना चाहती हूँ। तुम अकारण ही दया करने वाली हो, अतएव मेरी इस पुकार को अवश्य ही सुन लो। 'कृपालु' कहते हैं कि 'अंधा जब आँख पाय तब पतियाय' इस लोकोक्ति के अनुसार जब तुम मेरी पुकार सुन लोगी एवं मुझे अपने चरणों की धूल बना लोगी, तब ही मुझे तुम्हारे अकारण-करुण नाम पर विश्वास होगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 237

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
