दैन्य-माधुरी · पद 78
मोहिं स्वामिनि! अब अपनाइये।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: mohiṁ swāmini! aba apanāiye
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मोहिं स्वामिनि! अब अपनाइये।
2श्री बरसाने धाम आपुने, मोहूँ काहिं बसाइये।
3पलक पाँवड़े पंथ बिछाऊँ, जब जाइय या आइये।
4देउँ बुहारी रास मँडल महँ, रास करन जहँ जाइये।
5आवन देउँ न मदन मोहनहुँ, जब मानिनि पद पाइये।
6अपनिहिं दासिहिं मानि"कृपालुहिं"बारेक मोहिं बुलाइये॥
हिन्दी भावार्थ
हे वृषभानुनन्दिनी स्वामिनी जी! मुझे भी अपना बना लीजिये। अपने बरसाने धाम में मुझ को भी बसा लीजिये। तुम जब कहीं जाओगी या कहीं से आओगी तो मैं मार्ग में पलकों के पाँवड़े बिछाऊँगी और जहाँ आप रास करने जाएँगी उस रास मण्डल में बुहारी लगाऊँगी और जब आप मान करेंगी तब श्यामसुन्दर को पास नहीं फटकने दूँगी। 'कृपालु' कहते हैं कि बस मेरी यही इच्छा है कि एक बार मुझे अपनी दासी मानकर किसी सेवा के लिए मेरा नाम लेकर पुकार दीजिए।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 236