दैन्य-माधुरी · पद 80
लली करु महल टहलिनी मोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lalī karu mahala ṭahalinī moya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लली करु महल टहलिनी मोय।
2कोउ माँगत मायाभव वैभव, ऋद्धि सिद्धि कोउ तोय।
3कोउ माँगत मायापर मुक्ति न, सुख बैकुण्ठहुँ कोय।
4कोउ माँगत"हौं कछु नहिं माँगौं, देहु अवस्था सोय"।
5कोउ माँगत बैकुंठनाथ कहँ, छिन-छिन दरशन होय।
6हौ “कृपालु” माँगत सोइ दीजै, महल टहल हो जोय॥
हिन्दी भावार्थ
हे किशोरी जी! मुझे अपने महल को दासी बना लो। हे किशोरी जी! तुमसे कोई सांसारिक ऐश्वर्य माँगता है कोई ऋद्धि सिद्धि माँगता है, कोई मायातीत मुक्ति माँगता है कोई बैकुण्ठ का सुख माँगता है, कोई कुछ न माँगने की अवस्था माँगता है, कोई महाविष्णु का प्रतिक्षण दर्शन माँगता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं तो तुम्हारे कुंज महल की दासी बनकर तुम्हारी दासता ही चाहती हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 238