दैन्य-माधुरी · पद 81
लाल! तुम वृथहिं बजावत गाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lāla! tuma vṛithahiṁ bajāvata gāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लाल! तुम वृथहिं बजावत गाल।
2दुंदुभि घोष कहत वेदन"हौं, कारण रहित कृपाल"।
3पुनि निज वेदन तुमहिं बतावत, सर्वसमर्थ गुपाल।
4हौं संकेतहिं कह, पुनि श्रुति कह, सर्वज्ञहुँ तोहिं लाल।
5पुनि श्रुति सर्व नियंता कह पै, नियमत नहिं मन-चाल।
6होत हँसाइ “कृपालु” नाथ! या, देहु प्रेम तत्काल॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम झूठमूठ को अपनी प्रशंसा करते हो। तुमने वेदों में अपने लिए कहा है कि मैं तो बिना कारण के ही कृपा करता हूँ। पुनः वेदों में तुम ही ने अपने लिए यह भी कहा है कि मैं सर्वसमर्थ हूँ। मैं तो इशारे में कह रहा हूँ। पुन वेदों में तुमने यह भी कहा है कि मैं सर्वज्ञ हूँ। तुम्हीं ने पुनः वेदों में यह भी कहा है कि मैं सर्वनियन्ता हूँ। अब तुम ही सोचो उपर्युक्त इतनी शक्तियों की प्रशंसा करते हुए भी तुम मेरे मन तक को मोहित न कर सके। 'कृपालु' कहते हैं कि अब भी मौका है, प्रेम-दान कर दो अन्यथा तुम्हारी हँसी हो जायगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 238-239