दैन्य-माधुरी · पद 76
मनमोहन सों मन लाग रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: manamohana soṁ mana lāga re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1मनमोहन सों मन लाग रे।
2त्रिगुण त्रिकर्म त्रिताप आप ही, मन मंदिर ते भाग रे।
3भार डारि अपवर्ग स्वर्ग सुख, उमग्यो अति अनुराग रे।
4उनकोइ नाम रूप गुन गावत, ध्यावत मन रस पाग रे।
5छकी प्रेम रस नाचति गावति, काहुहिं द्वेष न राग रे।
6पै “कृपालु” इक बात बुरी भइ, लाग पतिव्रत दाग रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! हो गया। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म; दैहिक, दैविक, भौतिक ताप ये सब अपने आप ही मनमन्दिर से भाग गये। सात स्वर्ग एवं पाँच प्रकार के मोक्ष के सुख को भाड़ में डालकर मन में श्यामसुन्दर का अनुराग उत्पन्न हो गया है। अब तो उन्हीं के नाम, रूप, गुण आदि को गाते हुए प्रेम रस में विभोर रहती हूँ, कभी नाचती हूँ, कभी गाती हूँ। न किसी से मित्रता करती हूँ न किसी से शत्रुता। कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! लेकिन एक बात बड़ी बुरी हो गयी वह यह कि पातिव्रत धर्म में कलंक लग गया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 234-235