# मनमोहन सों मन लाग रे।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0227-M04-K076
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 76
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 102–102

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>मनमोहन सों मन लाग रे।  
<a id="line-2"></a>त्रिगुण त्रिकर्म त्रिताप आप ही, मन मंदिर ते भाग रे।  
<a id="line-3"></a>भार डारि अपवर्ग स्वर्ग सुख, उमग्यो अति अनुराग रे।  
<a id="line-4"></a>उनकोइ नाम रूप गुन गावत, ध्यावत मन रस पाग रे।  
<a id="line-5"></a>छकी प्रेम रस नाचति गावति, काहुहिं द्वेष न राग रे।  
<a id="line-6"></a>पै “कृपालु” इक बात बुरी भइ, लाग पतिव्रत दाग रे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! हो गया। सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण, संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म; दैहिक, दैविक, भौतिक ताप ये सब अपने आप ही मनमन्दिर से भाग गये। सात स्वर्ग एवं पाँच प्रकार के मोक्ष के सुख को भाड़ में डालकर मन में श्यामसुन्दर का अनुराग उत्पन्न हो गया है। अब तो उन्हीं के नाम, रूप, गुण आदि को गाते हुए प्रेम रस में विभोर रहती हूँ, कभी नाचती हूँ, कभी गाती हूँ। न किसी से मित्रता करती हूँ न किसी से शत्रुता। कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! लेकिन एक बात बड़ी बुरी हो गयी वह यह कि पातिव्रत धर्म में कलंक लग गया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 234-235

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
