दैन्य-माधुरी · पद 75
भयो को मो सम पतित बड़ो?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bhayo ko mo sama patita bad̤o?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1भयो को मो सम पतित बड़ो?।
2लखि अनंत पापन की गठरी, जम को कान खड़ो।
3अजामील आदिक तो झूठेहिं, पतितन नाम पड़ो।
4वे तो कछुक काल के ही रह, पापन कछुक जड़ो।
5पै हौं अमित जनम को पापी, अबहूँ हठहिं अड़ो।
6चक्रादिकन “कृपालु” न फूटिय, मम उर पाप घड़ो॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! मेरे समान महान् पापी आज तक कोई भी नहीं हुआ। अनादिकाल से अनन्तानन्त जन्मों के अनन्तानन्त पापों के बोझ को देखकर यमराज के भी कान खड़े हो गये हैं अर्थात् वे भी घबड़ा गये हैं। अजामिल आदिकों का नाम पतितों की सूची में झूठमूठ ही लिखा गया है, क्योंकि वे तो कुछ ही समय के कुछ ही पापों से युक्त थे। किन्तु मैं तो अनन्त जन्मों का पापी हूँ और यह जानते हुए भी कि पाप नहीं करना चाहिये, अब भी हठ पर अड़ा हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि नाथ! मेरे हृदय में रहने वाला यह अनन्त पापों से भरा हुआ घड़ा आप के चक्र आदि महान्-से-महान् अस्त्र-शस्त्रों से भी नहीं फूट सकेगा अर्थात् कृपालु तो एकमात्र अकारण ही कृपा चाहता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 233-234