# भयो को मो सम पतित बड़ो?।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0226-M04-K075
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 75
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 102–102

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भयो को मो सम पतित बड़ो?।  
<a id="line-2"></a>लखि अनंत पापन की गठरी, जम को कान खड़ो।  
<a id="line-3"></a>अजामील आदिक तो झूठेहिं, पतितन नाम पड़ो।  
<a id="line-4"></a>वे तो कछुक काल के ही रह, पापन कछुक जड़ो।  
<a id="line-5"></a>पै हौं अमित जनम को पापी, अबहूँ हठहिं अड़ो।  
<a id="line-6"></a>चक्रादिकन “कृपालु” न फूटिय, मम उर पाप घड़ो॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! मेरे समान महान् पापी आज तक कोई भी नहीं हुआ। अनादिकाल से अनन्तानन्त जन्मों के अनन्तानन्त पापों के बोझ को देखकर यमराज के भी कान खड़े हो गये हैं अर्थात् वे भी घबड़ा गये हैं। अजामिल आदिकों का नाम पतितों की सूची में झूठमूठ ही लिखा गया है, क्योंकि वे तो कुछ ही समय के कुछ ही पापों से युक्त थे। किन्तु मैं तो अनन्त जन्मों का पापी हूँ और यह जानते हुए भी कि पाप नहीं करना चाहिये, अब भी हठ पर अड़ा हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि नाथ! मेरे हृदय में रहने वाला यह अनन्त पापों से भरा हुआ घड़ा आप के चक्र आदि महान्-से-महान् अस्त्र-शस्त्रों से भी नहीं फूट सकेगा अर्थात् कृपालु तो एकमात्र अकारण ही कृपा चाहता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 233-234

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
