दैन्य-माधुरी · पद 74
बेर भइ टेरत नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bera bhai ṭerata nandakumāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बेर भइ टेरत नंदकुमार।
2द्वार परो रिरियात पतित इक, तुम पतितन रखवार।
3संतन कहत पतितपावन तोहिं, पुनि कत करत अबार।
4सोये जाय क्षीरसागर या, कान तेल लिय डार।
5अथवा भयो समाप्त तिहारो, करुणा को भण्डार।
6या किय मान “कृपालु” मानिनिहिं, रिझवत कुंज मझार॥
हिन्दी भावार्थ
हे नन्दकुमार! तुम सरीखे पतितों की रक्षा करने वालों के होते हुए भी तुम्हारे द्वार पर मुझ पतित को रोते गिड्गिड़ाते एवं पुकारते हुए बड़ी देर हो गई है, फिर भी तुम नहीं सुन रहे हो। महापुरुष तुमको पतित पावन नाम से पुकारते हैं, फिर भी तुम अपना नाम सार्थक करने में देर कर रहे हो। हे श्यामसुन्दर! क्या महाविष्णु बनकर महाप्रलय के पहले ही क्षीर सागर में सो गये अथवा अपने दोनों कानों में तेल डाल लिया है जो हमारी करुण-पुकार नहीं सुन पा रहे हो अथवा तुम्हारा करुणा का कोष ही अब समाप्त हो गया है। 'कृपालु' कहते हैं कि उपरोक्त बातें तो श्यामसुन्दर के विषय में सोची भी नहीं जा सकती। हाँ, यह संभव है कि किशोरी जी ने मान किया हो, एवं उन्हीं को प्रसन्न करने के हेतु ब्रज की निकुँज में मजाने में संलग्न हों।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 232-233