# बेर भइ टेरत नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0225-M04-K074
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 74
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 101–102

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>बेर भइ टेरत नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>द्वार परो रिरियात पतित इक, तुम पतितन रखवार।  
<a id="line-3"></a>संतन कहत पतितपावन तोहिं, पुनि कत करत अबार।  
<a id="line-4"></a>सोये जाय क्षीरसागर या, कान तेल लिय डार।  
<a id="line-5"></a>अथवा भयो समाप्त तिहारो, करुणा को भण्डार।  
<a id="line-6"></a>या किय मान “कृपालु” मानिनिहिं, रिझवत कुंज मझार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे नन्दकुमार! तुम सरीखे पतितों की रक्षा करने वालों के होते हुए भी तुम्हारे द्वार पर मुझ पतित को रोते गिड्गिड़ाते एवं पुकारते हुए बड़ी देर हो गई है, फिर भी तुम नहीं सुन रहे हो। महापुरुष तुमको पतित पावन नाम से पुकारते हैं, फिर भी तुम अपना नाम सार्थक करने में देर कर रहे हो। हे श्यामसुन्दर! क्या महाविष्णु बनकर महाप्रलय के पहले ही क्षीर सागर में सो गये अथवा अपने दोनों कानों में तेल डाल लिया है जो हमारी करुण-पुकार नहीं सुन पा रहे हो अथवा तुम्हारा करुणा का कोष ही अब समाप्त हो गया है। 'कृपालु' कहते हैं कि उपरोक्त बातें तो श्यामसुन्दर के विषय में सोची भी नहीं जा सकती। हाँ, यह संभव है कि किशोरी जी ने मान किया हो, एवं उन्हीं को प्रसन्न करने के हेतु ब्रज की निकुँज में मजाने में संलग्न हों।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 232-233

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
