दैन्य-माधुरी · पद 73
बार कत करति हमारिहिं बार!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bāra kata karati hamārihiṁ bāra?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बार कत करति हमारिहिं बार!
2राधे नाम सुनत ही धावति, सरल सुभायनहार।
3यों रसिकन मुख कहत सुन्यों पुनि, क्यों निष्ठुरता धार।
4हौं तो कुटिल अनादि काल को, अमित अघन अवतार।
5पै तुम तो बिनु हेतु सनेहिनि, याको मोहिं विचार।
6ताहू ते “कृपालु” बड़ चिंता, रसिक कहाउ लबार॥
हिन्दी भावार्थ
हे महाभावस्वरूपिणि राधे! हमारी ही बार इतनी देर क्यों कर रही हो? तुम तो अपने सरल-स्वभाव-वश 'राधे नाम सुनते ही अति अधीर होकर पतितों के पास आ जाया करती हो, ऐसा महापुरुषों के मुख से कहते हुए सुना है, फिर इतनी निठुराई क्यों धारण कर ली है? मैं यह मानता हूँ कि मैं अनादि काल का ही पतित हूँ। सचमुच पूछा जाय तो मैं अनन्त पापों का साक्षात् अवतार ही हूँ, पर फिर भी तुम्हें बिना कारण ही प्रेम करने वाली सुनकर मुझे आश्चर्य होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि इससे भी बड़ी चिंता मुझे इस बात की है कि तुम्हारे रसिक जन लबार कहलायेंगे, उनकी बात का विश्वास संसार से उठ जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 232