दैन्य-माधुरी · पद 72
बार इक हेरहु हमरिहिं ओर।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bāra ika herahu hamarihuṁ ora
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बार इक हेरहु हमरिहिं ओर।
2इक कुपूत रिरियात द्वार पर, करहु कृपा की कोर।
3सुन्यो पढ्यो सब वेद पुरानन, मन न मान बरजोर।
4समुझावत दिन रात तबहुँ यह, पियत विषय-विष घोर।
5तुम चितचोर कहावत पुनि कत, लेत न मम चित चोर।
6नेकु दिखाउ"कृपालुहिं"झाँकी, घटि न जाय कछु तोर॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! एक बार हमारी ओर भी देख लो। मैं एक कुपुत्र द्वार पर पड़ा हुआ रिरिया रहा हूँ। मेरे ऊपर भी थोड़ी सी कृपा कर दो। मैंने वेदों पुराणों को बहुत पढ़ा, बहुत सुना, किन्तु यह बलवान मन नहीं मानता। इसे दिन रात समझाता हूँ, फिर भी यह विषयों के विष को ही पीता रहता है। तुम्हें तो सन्त लोग चितचोर कहते हैं, फिर तुम हमारे चित्त को क्यों नहीं चुरा लेते? 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे भी जरा सी झाँकी दिखा दीजिये। इसमें तुम्हारा क्या घट जायगा?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 231