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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 71

बात इक सुनो कान्ह! दै कान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bāta ika suno kānha! dai kāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1बात इक सुनो कान्ह! दै कान।

2हम अभिमानी सदा सदा के, माया माहिं भुलान।

3तुम्हरी अनुकंपा बिनु तुम कहँ, कौन सक्यो है जान।

4बिनु जाने, माने किमि, यामें, अचरज कौन महान?।

5पुनि बिनु माने मनमाने बनि, करत विषय को ध्यान।

6हम “कृपालु” मतिमंद आपुनो, दोष सकत नहिं मान॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! मैं एक बात कहता हूँ, कान खोलकर सुन लो। मैं मानता हूँ कि मैं अनादिकाल से ही तुम्हारी माया में भूला हुआ, अभिमानवश तुम्हारी शरण में नहीं आया। पर मैं यह पूछता हूँ कि बिना तुम्हारी कृपा के तुमको आज तक कौन जान सका है और बिना जाने यदि तुम्हें कोई नहीं मानता तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। जब तुमको कोई नहीं मानेगा तो स्वभावतः ही मनमाना बनकर सांसारिक विषयों की ओर उन्मुख होगा। 'कृपालु' कहते हैं कि महाराज बुरा न मानियेगा, हम अत्यन्त मूर्ख हैं। अतएव जब तक तुम अकारण-कृपा न करोगे हम अपना दोष भी मानने को तैयार न होंगे। सदा तुमको ही सदोष कहेंगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 230-231