दैन्य-माधुरी · पद 70
बनहुँ कब प्रेम सरोवर मीन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: banahuṁ kaba prema sarovara mīna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बनहुँ कब प्रेम सरोवर मीन।
2धरि तनु मीन सलिल कहँ नित प्रति, करिहौं मल ते हीन।
3करिहौं होड़ दृगन ते दोउन, यद्यपि इन उन दीन।
4जब विहरैं प्रियतम प्यारी दोउ, कोटि काम छवि छीन।
5तब हौं उछल उछल जल ऊपर, विहरौं रसरँग भीन।
6इमि “कृपालु” बलिहार जाउँ लखि, लीला नित्य नवीन॥
हिन्दी भावार्थ
हम कब प्रेम सरोवर की मछली बनेंगे? मछली का शरीर धारण करके सदा प्रिया-प्रियतम के जल-विहार के लिए जल को निर्मल रखेंगे। यद्यपि मेरी आँखों को सौंदर्य श्यामसुन्दर ने ही दिया है फिर भी उनकी आँखों से होड़ करेंगे। युगल सरकार के जलविहार की छवि करोड़ों कामदेव के सौन्दर्य को भी फीका कर देती है। जब युगल सरकार जल-विहार करेंगे तब हम भी आनन्द में विभोर होकर उछल उछल कर उन्हीं के साथ विहार करेंगे। 'कृपालु' कहते हैं कि इस प्रकार उनकी नित्य नयी लीलाओं को देखकर हम बलिहार जायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 229-230