दैन्य-माधुरी · पद 69
बनत तुम जानि जानि अनजान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: banata tuma jāni jāni anajāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1बनत तुम जानि जानि अनजान।
2हम तो कान्ह अनादि काल ते, माया माहिं भुलान।
3बाँध्यो आपु आपु कहँ कर्मन, मकड़ी-जाल समान।
4हम पूछत सुर नर मुनि महँ कोउ, है? अस देहु प्रमान।
5तव माया को जीति सकै जो, साधन कियेहु महान।
6ताते लो अपनाय"कृपालुहिं", करिके प्रेम प्रदान॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम जान-जान के अनजान बनते हो। हम तो अनादि काल से ही तुम्हारी माया में भूले हुए हैं। संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्मों के द्वारा मकड़ी के जाल के समान मैंने अपने आप ही अपने को बाँध रखा है। हम पूछते हैं कि सुर,नर, मुनि में कोई एक भी प्रमाण दे दो जो महान् साधन करके भी आपको माया को जीत सका हो। 'कृपालु' कहते हैं कि अपना विशुद्ध प्रेम देकर मुझे अपना बना लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 229