दैन्य-माधुरी · पद 66
पीर हरि! तुम बिनु कौन हरे?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pīra hari! tuma binu kauna hare?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पीर हरि! तुम बिनु कौन हरे?।
2दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे।
3लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे।
4मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे।
5छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे।
6नर तनु पाय “कृपालु” चेत न तु, परि भवकूप मरे॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे बिना हमारे दुःख और कौन दूर करे? अब तक दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों तापों में अत्यधिक जल चुका। जड़ जंगम चौरासी लाख योनियों के अनेक प्रकार के शारीरिक स्वाँग बनाये। जिस प्रकार हिरन मरुस्थल में मिथ्या मृगजल के हेतु निरन्तर दौड़कर भी परिणाम में दुःख ही पाता है, उसी प्रकार मैं भी सांसारिक विषयों में निरन्तर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भी सुख न पा सका, इन इन्द्रियों के घड़े न भर सके। हमारी सांसारिक विषय-वासनायें उसी प्रकार बढ़ती जा रही हैं जिस प्रकार आग में घी पड़ने पर आग बढ़ती जाती है। 'कृपालु' कहते हैं कि मानव-देह पाकर अब तू शीघ्र ही सावधान हो जा अर्थात् भगवान् के शरणागत हो जा अन्यथा फिर संसार-रूपी कुएँ में पड़कर दुःखी हुआ करेगा यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 226-227