# पीर हरि! तुम बिनु कौन हरे?।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0217-M04-K066
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 66
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 98–98

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पीर हरि! तुम बिनु कौन हरे?।  
<a id="line-2"></a>दैहिक दैविक भौतिक तापन, अब लौं बहुत जरे।  
<a id="line-3"></a>लख चौरासी योनि चराचर, बहु विधि स्वाँग धरे।  
<a id="line-4"></a>मृग मृगजल ज्यों धाय रैन दिन, इंद्रिन घट न भरे।  
<a id="line-5"></a>छिन छिन बाढ़ति जाति वासना, ज्यों घृत अगिनि परे।  
<a id="line-6"></a>नर तनु पाय “कृपालु” चेत न तु, परि भवकूप मरे॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे बिना हमारे दुःख और कौन दूर करे? अब तक दैहिक, दैविक, भौतिक इन तीनों तापों में अत्यधिक जल चुका। जड़ जंगम चौरासी लाख योनियों के अनेक प्रकार के शारीरिक स्वाँग बनाये। जिस प्रकार हिरन मरुस्थल में मिथ्या मृगजल के हेतु निरन्तर दौड़कर भी परिणाम में दुःख ही पाता है, उसी प्रकार मैं भी सांसारिक विषयों में निरन्तर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते भी सुख न पा सका, इन इन्द्रियों के घड़े न भर सके। हमारी सांसारिक विषय-वासनायें उसी प्रकार बढ़ती जा रही हैं जिस प्रकार आग में घी पड़ने पर आग बढ़ती जाती है। 'कृपालु' कहते हैं कि मानव-देह पाकर अब तू शीघ्र ही सावधान हो जा अर्थात् भगवान् के शरणागत हो जा अन्यथा फिर संसार-रूपी कुएँ में पड़कर दुःखी हुआ करेगा यह मानव देह देवताओं को भी दुर्लभ है, बार-बार नहीं मिलेगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 226-227

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
