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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 67

प्रभु जी! भले बुरे हम तेरे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prabhu jī! bhale bure hama tere

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1प्रभु जी! भले बुरे हम तेरे।

2उदर भरे पर महा आलसी, सोवत साँझ सवेरे।

3काम क्रोध अरु ममता तृष्णा, रहत सदा नित घेरे।

4माया-वश सब जनम गमायो, भटक फिरे बहुतेरे।

5तुम बिनु कौन सहायक मेरो, बैरी बहुत घनेरे।

6दास “कृपालु” आस तजि सब की, भये श्याम के चेरे॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! हम अच्छे या बुरे जैसे भी हैं तुम्हारे हैं। पेट भरने पर अत्यन्त आलस्य से युक्त होकर सायंकाल से प्रातः काल तक सोते रहते हैं। हे नाथ! काम, क्रोध, ममता एवं लालच आदि ने मेरे ऊपर पूर्ण अधिकार जमा रखा है आपकी माया के वशीभूत होकर सारा जीवन इधर-उधर भटक कर व्यर्थ ही गँवा दिया है। तुमको छोड़कर दूसरा कोई भी मेरी सहायता करने वाला नहीं है। सभी स्वजन बनकर शत्रु की भाँति स्वार्थ सिद्ध करना चाहते हैं। 'कृपालुदास' तो सभी आशाओं को छोड़कर एवं सबसे संबंध तोड़ कर श्यामसुन्दर के दास हो गये हैं। वे अच्छे, बुरे जैसे भी हैं, अब एकमात्र हमारे हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 227-228