दैन्य-माधुरी · पद 64
पिया! मोहिं कब ह्वै हौ दुखदाई?।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: piyā! mohiṁ kaba hvaihau dukhadāī?
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पिया! मोहिं कब ह्वै हौ दुखदाई?।
2जेहि लगि कोटि-कलप तप करिके, कमलाहू नहिं पाई।
3बोय बीज उर मधुर वेदना, सिंचिहौं दृग झरि लाई।
4दीरघ श्वास-पवन विरहानल, रविकर लहि अँखुवाई।
5येहि विधि बढ़ि तरुवर-फल यह मिल, पलक कलप सम जाई।
6तब “कृपालु” विरहिणि जड़ जंगम, प्रियतम रूप लखाई॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेमिका कहती है कि हे प्रियतम! तुम मुझे कब विरहिणी बनाकर मेरे लिए दुःखदाई बनोगे। जिस गोपी-विरह के दुःख को करोड़ों कल्पों तक तपस्या करके भी महालक्ष्मी हीं प्राप्त कर सकीं, हे प्रियतम! यदि तुम उस मधुर-वेदना का प्रेम भी हमको प्रदान कर दो तो हम उसे अपने हृदय में ब्रेकर आँखों के आँसुओं से निरन्तर सींचा करें तथा तुम्हारे वियोग में जो हमारे हृदय से लम्बी-लम्बी साँसें निकलें उन्ही रवासों की हवा तथा विरहाग्नि-रूप सूर्य का ताप उस बीज को दिया करें। जिसके परिणाम-स्वरूप अर्थात् वायु, जल एवं सूर्य के ताप को पाकर, मधुर-वेदना का बीज अंकुरित हो उठे तत्पश्चात् इसी प्रकार जल, वायु एवं सूर्यताप को निरन्तर पाकर वह बीज वृक्ष बन जाय तथा इस वृक्ष में वही मधुर फल लगे जिसे हम तुमसे माँग रही हैं। फल यह है कि तुम्हारे बिना एक क्षण भी कल्प के समान प्रतीत हो। 'कृपालु' कहते है कि यदि कोई अल्पज्ञ यह सोचे कि इतने घोर परिश्रम के पश्चात् ऐसे कडवे फल से क्या लाभ, तो उत्तर में कहते हैं कि इसको पाकर विरहिणी स्थावर-जंगमात्मक समस्त विश्व में अपने ही प्रियतम के स्वरूप का अवलोकन करेगी। उदाहरणार्थ गोपियाँ'-सूर की वाणी में "जित देखूँ तित श्याममई है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 224-225