दैन्य-माधुरी · पद 63
पतित इक देत चुनौती आय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: patita ika deta chunautī āya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1पतित इक देत चुनौती आय।
2लखि हमरे अगनित पापन कहँ, जमहूँ अति डरपाय।
3हौं नहिं तनु ही की कुबरी प्रभु, मनहुँ कुटिल बहुताय।
4तव सनमुखहूँ दीन बनत नहिं, रह अहमिति अधिकाय।
5पतित उधारन विरद जात अब, अथवा मोहिं अपनाय।
6मन मोहहु “कृपालु” मुरलिहिं-धुनि, या पुनि चक्र चलाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! एक महान् पतित तुम्हें चुनौती दे रहा है। जानते हो? हमारे अनन्त पापों से यमराज भी डरता है। तक तुम्हारा पाला शरीर-सम्बन्धी कुबरी से ही पड़ा है। हमारा तो मन भी अनंत कुटिलताओं से भरा है। हृदय में इतना अहंकार है कि तुम्हारे समक्ष भी दीन नहीं बन पाता; अब तुम्हारा पतित पावन का बाना बदनाम होने जा रहा है, अन्यथा मुझे तुरंत अपना लो। 'कृपालु' कहते हैं कि या तो सुरीली मुरली को तान से मेरा मन मोहित कर लो या फिर चक्र चलाकर अपने धाम में बुला लो!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 223-224