दैन्य-माधुरी · पद 62
न्याय अब तुम ही करो ब्रजराज!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nyāya aba tuma hī karo brajarāja!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1न्याय अब तुम ही करो ब्रजराज!
2हम पतितन सरताज, तुमहिं कह, पतितन को सरताज।
3दोउ राजा निज प्रजा पूज्य अति, साजे निज निज साज।
4पतितन प्यार करत दोउन को, कबहुँ न आई लाज।
5पतितन ही सों हमरो तुम्हरो, नाम बड़ों जग आज।
6पुनि “कृपालु” तुम कत बिनु पातक, हम पातकन जहाज॥
हिन्दी भावार्थ
हे ब्रजराज! हमारे तुम्हारे निम्नलिखित झगड़े का निर्णय हम तुम्हीं से चाहते हैं। हम भी यदि पापियों के सरताज हैं तो तुम भी तो पतित पावन रूप से पापियों के सरताज हो। हम और तुम दोनों ही पतित जनों के अति ही पूज्य हैं, भले ही साज पृथक्-पृथक् क्यों न हों अर्थात् जो पतित तुम्हारी शरण नहीं गये, उन सबके पूज्य हम हैं, तथा जो पतित तुम्हारी ही शरण में चले गये हैं उनके पूज्य तुम हो। हम और तुम दोनों पतितों से प्यार करने में थोड़ा भी संकोच नहीं करते। पतितों से ही हमारा और तुम्हारा दोनों का ही नाम संसार में प्रख्यात है। कृपालु' कहते हैं कि मुझे आश्चर्य है कि फिर तुम किस प्रकार पतितों के समस्त पापों को लेकर भी निष्पाप बने रहते हो और मैं प्रतिक्षण पापों के बोझों से दबा जा रहा हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 222-223