दैन्य-माधुरी · पद 61
नाम बड़ दर्शन छोटे श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nāma, bad̤a darshana chhoṭe shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाम बड़ दर्शन छोटे श्याम।
2लख चौरासी योनि भ्रमत हौं, आयो सुनि बड़ नाम।
3कोउ कह श्याम पतितपावन कोउ, दीनबंधु सुखधाम।
4कोउ कह सो बिनु हेतु सनेही, रहत ठड़ो सब ठाम।
5पै इत नामहिं नाम लख्यों बस, लख्यों नाहिं कछु काम।
6हौं “कृपालु” नहिं चहौं और कछु, चहौं प्रेम निष्काम॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! तुम्हारा नाम ही नाम बहुत प्रसिद्ध है, किंतु काम वैसा नहीं है। तुम्हारे प्रख्यात नाम को सुनकर ही चौरासी लाख योनियों में घूमकर तुम्हारे द्वार पर आया हूँ। कोई तुम्हें पतितपावन कहता है, कोई दीनबन्धु कहता है, और कोई तो यहाँ तक कहता है कि आप सर्वत्र खड़े-खड़े अकारण ही प्रेम करने के लिए तैयार रहते हैं। पर मैंने तो नाम ही नाम सुना, अभी तक नाम के अनुसार काम नहीं पाया। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं और कुछ नहीं चाहता केवल तुम्हारा निष्काम प्रेम ही चाहता हूँ। यदि न दोगे तो तुम्हारा नाम बदनाम हो जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 222