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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 60

नाथ! हौं तुमहिं सोचि पछितात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! hauṁ, tumahiṁ sochi pachhitāta

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1नाथ! हौं तुमहिं सोचि पछितात।

2पितु सर्वज्ञ सर्वव्यापक अरु, सर्वसमर्थ कहात।

3ता सुत द्वार लक्ष चौरासी, माँगत भीख लखात।

4जानत जगहुँ कौन सुत, पितु कहँ, जासु बनी यह गात।

5पुनि ज्ञानिहुँ-अज्ञेय पिता कहँ, किमि हौं जानि सकात।

6याते करु “कृपालु” अनुकंपा, पितहिं लाज अब जात॥

हिन्दी भावार्थ

हे नाथ! मुझे अपना पछतावा कुछ नहीं है, केवल तुम्हारे विषय में ही चिंता है। जो पिता सर्वज्ञ, सर्वव्यापक एवं सर्वसमर्थ कहलाता हो, उसका पुत्र चौरासी लाख दरवाजों पर भिक्षा माँगता फिरे, इसमें पिता का ही अपयश है। संसार में भी कौन सा नवजात शिशु अपने माता-पिता को जानता है किंतु फिर भी माता-पिता यथाशक्ति उसका योग-क्षेम वहन करते ही हैं। तुम तो महान् ज्ञानियों से भी अज्ञेय हो, फिर हम अज्ञानी तुम्हें कैसे जान सकते हैं कृपालु' कहते हैं-इसलिए हे नाथ! अब अपने पुत्र पर कृपा करो एवं अपने वात्सल्य से कृतार्थ करो, अन्यथा पिता की ही लाज जायगी।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 221