दैन्य-माधुरी · पद 59
नाथ! हौं गयो सबै विधि हार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! hauṁ gayoṁ sabai vidhi hāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! हौं गयो सबै विधि हार।
2धरि धरि स्वाँग लक्ष चौरासी, नाच्यों अगनित बार।
3मात पिता बनितादिक झूठेहिं, जोरे नात हजार।
4"यह मेरो","यह तेरो", करि करि, सिगरो लियो बिगार।
5त्रिगुन पाश लै आपुहिं अपनेहिं, कर गर फाँसी डार।
6पै “कृपालु” चह मुक्ति न, बंधन, तव पदकमल मझार॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! अब मैं सब प्रकार से हारकर थक गया हूँ। स्थावर-जंगम-स्वरूप चौरासी-लाख योनियों का भिन्न-भिन्न स्वाँग बनाकर इस माया के रंगमंच पर अनन्त बार नाच चुका। माता, पिता, स्त्री इत्यादि सांसारिक संबंधियों से झूठ-मूठ ही अपना संबंध अनंत बार जोड़कर अपने आपको धोखा दे चुका। 'यह पदार्थ मेरा है'तथा 'वह पदार्थ तुम्हारा है', ऐसी मिथ्या कल्पनाएँ करके अपना आदि-अंत सब-कुछ बिगाड़ चुका। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण इन तीन गुणों की रस्सी लेकर अपने-आप ही अपने गले में फासी डाल चुका हूँ। किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि मैं केवल इस फाँसी से छूटना नहीं चाहता, अर्थात् केवल मोक्ष पद ही नहीं चाहता, वरन् तुम्हारे चरण कमलों में वही उपरोक्त बंधन चाहता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 220-221