दैन्य-माधुरी · पद 58
नाथ! यह माया कौन बलाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! yaha māyā kauna balāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! यह माया कौन बलाय।
2श्रुति कह माया शक्ति तिहारी, जड़ सुभाय पुनि वाय।
3तबहुँ नचावति सुर नर मुनि कहँ, यह अचरज दरसाय।
4पाय प्रेरणा-शक्ति तिहारी, माया, शक्ति दिखाय।
5तुम्हरी शक्ति समक्ष नाथ मम, शक्ति कहा करि पाय।
6अब निज शक्ति हिं बरजि"कृपालुहिं", लो कृपालु अपनाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे नाथ! यह माया कौन सी बलाय है। वेद कहता है कि माया तुम्हारी जड़ स्वभाव वाली बहिरंग शक्ति है। जड़ होते हुए भी बड़े-बड़े सुर, नर, मुनियों को भी अपने इशारे पर नचाती है, यही महान् आश्चर्यमय विषय है। संत लोग कहते हैं कि तुम्हारी यह माया शक्ति तुम्हारी ही प्रेरणा-शक्ति पाकर अपनी शक्ति दिखाती है। हे नाथ! तुम्हीं बताओ, तुम्हारी शक्ति के सन्मुख यह शक्ति क्या कर सकती है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे कृपालु अब अपनी शक्ति को रोक लो, एवं मुझे सदा के लिए अपना लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 219-220