दैन्य-माधुरी · पद 57
नाथ! यह कौन तिहारो न्याय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! yaha kauna tihāro nyāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! यह कौन तिहारो न्याय।
2जगत जननि देखत सुत कैसेहुँ, विष रस पी न सकाय।
3शिशु नवजात न जान हिताहित, यह जानति सब माय।
4तुम छिन छिन जानत गति मन की, वेद पुरान बताय।
5पुनि तुम्हरे देखत तव सुत कत, पियत विषय-विष हाय।
6कह “कृपालु” "बिनु हेतु सनेही", यह उपाधि अब जाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! यह तुम्हारा कौन सा नियम है संसार में भी किसी माता के देखते हुए उसका पुत्र विष पान नहीं कर सकता, क्योंकि संसारी माता भी यह समझती है कि मेरा भोला-भाला बच्चा अपना हित अहित नहीं समझता। वेद पुराण बताते हैं कि तुम मन की प्रत्येक क्षण की गति को जानते हो अतः आश्चर्य है कि तुम्हारे प्रतिक्षण देखते हुए भी तुम्हारा पुत्र विषय रूपी विष का पान कर रहा है। 'कृपालु' कहते हैं-फिर साथ ही तुर्रा यह है कि तुम बिना कारण ही प्यार करते हो। अतएव या तो अपना प्यार दो, नहीं तो यह तुम्हारी बिनु हेतु-सनेही की उपाधि चली जायगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 219