लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 56

नाथ! मोहिं कीजै दासन दास।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! mohiṁ kījai dāsana-dāsa

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1नाथ! मोहिं कीजै दासन दास।

2तिनको दरस परस नित पावूँ, छिन छिन को सहवास।

3तन मन धन सों सदा एक रस, सेऊँ सहित हुलास।

4सुनत करत सतसंग अनवरत, जग सों रहूँ उदास।

5निर्भय रहूँ कृपा ते तिन की, लहूँ प्रेम सुख रास।

6माँगत भीख “कृपालु” कृपा करि, पुरवहु मम अभिलास॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! मुझे अपने दासों-का-दास बना लीजिए। जिनके दर्शन एवं स्पर्श को निरन्तर पाकर, अति प्रसन्नतापूर्वक तन, मन,धन से निरन्तर एक रस होकर सेवा करता रहूँ। उनका निरन्तर सत्संग सुनते एवं करते हुए संसार की समस्त वासनाओं से पूर्ण उदासीन हो जाऊँ। उनकी कृपा से सदा निर्भय रहते हुए समस्त सुखों की राशिस्वरूप निष्काम प्रेम प्राप्त कर सकूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं भिक्षुक बनकर उपर्युक्त भिक्षा माँग रहा हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 218