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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 55

नाथ! जनि अब मो कहँ बहकाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! jani aba mo kahaṁ bahakāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1नाथ! जनि अब मो कहँ बहकाय।

2जिमि जननी निज शिशुहिं खिलौनहिं, दै गृह काजहिं जाय।

3सुत बनितादि खिलौनहिं दै तिमि, अब लौं मोहिं बहलाय।

4उत जग-जननि काज करि निज सुत, लेति गोद बैठाय।

5पै तुम कहँ कछु काज न तबहूँ, कबहुँ न सुत उर लाय।

6अब “कृपालु” तजि खेल खिलौनहिं, लोटत रुदन मचाय॥

हिन्दी भावार्थ

हे नाथ। अब मुझे मिथ्या वस्तुओं से मत फुसलाओ। जिस प्रकार सांसारिक माता देकर फुसला देती है एवं स्वयं घर का काम करने चली जाती है, उसी प्रकार तुमने भी मुझे स्त्री, पति आदि खिलौने देकर अब तक बहुत बहलाया। एक आश्चर्य है कि संसार की माँ तो घर का काम करके अपने बच्चे को अपने आप गोद में बिठाकर खिलाती-पिलाती एवं दुलार करती है, किंतु तुम्हें कुछ काम न होते हुए भी तुमने अभी तक मुझ पुत्र को एक बार भी हृदय से नहीं लगाया। 'कृपालु' कहते हैं-अब मैंने भी रसिकों के परामर्श से सब खिलौनों को पटक कर, मचल कर, बालवत् करुण क्रन्दन करने की ठान ली है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 217-218