दैन्य-माधुरी · पद 54
नाथ! अब लाज तिहारी जात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! aba lāja tihārī jāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! अब लाज तिहारी जात।
2झूठमूठ लै नाम तिहारो, कियो दंभ दिन रात।
3भोरो जगत जान मोहिं तुम्हरो, भगत जगत विख्यात।
4अब जो नहिं अपनाउ नाथ मोहिं, नामहुँ लाज नसात।
5आपुहिं आपुन जांघ उघारे, आपु लाज की बात।
6न्याय “कृपालु” न याचत नाथहिं, चहत कृपा बलभ्रात॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! अब तुम्हारी लज्जा जा रही है। झूठमूठ को ही तुम्हारा नाम लेकर दिन-रात लोकरंजन करता रहा। भोला-भाला संसार मुझे तुम्हारा समझ कर प्रसिद्ध भक्त मानता है। तुमने मुझे नहीं अपनाया तो तुम्हारे नाम की भी लज्जा चली जायगी। मुझे क्या चिंता है। अपनी जाँघ को आप ही उघारने पर आपको ही लज्जा चली जायगी। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं अपने कर्मों का न्याय नहीं चाहता; मैं तो करुणाकर की कृपा ही चाहता हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 217