दैन्य-माधुरी · पद 53
नाथ! अब भटकत थकि गये पाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! aba bhaṭakata thaki gaye pāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! अब भटकत थकि गये पाम।
2पुनि पुनि जनमि जनमि दुख पायो, नहिं पायो विश्राम।
3जूते लात खात पति वनितनि, नहिं अबहूँ उपराम।
4पढ़त सुनत जानत मानत पै, मन ठानत हठ बाम।
5यद्यपि तव लीला गुन गावत, लेत तुम्हारोइ नाम।
6तदपि “कृपालु” कृपालु कृपा बिनु, छुटै न इंद्रिन काम॥
हिन्दी भावार्थ
हे नाथ! अब भटकते-भटकते पाँव अत्यंत थक गये। चौरासी लाख योनियों में बार-बार जन्म ले लेकर एक क्षण को भी विश्राम नहीं पाया है। अनंतानंत जन्मों में अनंतानंत स्त्री-पतियों से अनंतानंत बार अपमानित होने पर भी उनसे विरक्ति नहीं हो पायी। भगवत् सम्बंधी बातें पढ़ते, सुनते जानते, मानते हुए भी मन हठ नहीं छोड़ता। यद्यपि मुख से तुम्हारी ही लीला एवं गुणों को गाते हैं तथा तुम्हारा ही नाम संकीर्तन करते हैं, 'कृपालु' कहते हैं तथापि कृपालु श्यामसुन्दर की कृपा के बिना इन्द्रियों की विषयासक्ति नहीं छूट सकती।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 216