दैन्य-माधुरी · पद 52
नाथ! अब बूड़त लेहु बचाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nātha! aba būd̤ata lehu bachāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नाथ! अब बूड़त लेहु बचाय।
2अति अगाध भवसिंधु दयानिधि, ओर छोर नहिं पाय।
3विविध वासना तुंग-तरंगनि, बन्यों खिलौना हाय।
4पुत्र कलत्र मित्र आदिक जे, कच्छ मच्छ बनि खाय।
5लै जलयान टेर गुरु-केवट, सोउ मोहिं मकर लखाय।
6लागु गोहारि बचाउ"कृपालुहिं"तुम कृपालु यदुराय॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! अब मैं भवसागर में बिल्कुल डूब सा रहा हूँ, जल्दी ही बचाइये। यह भवसागर इतना गहरा है कि जिसकी कोई थाह नहीं है तथा कहीं किनारा भी नहीं दिखाई पड़ता। अनेक प्रकार की लौकिक इच्छाओं की अत्यन्त ऊँची तरंगों में मैं खिलवाड़ सा बन गया हूँ। पुत्र, स्त्री, मित्र इत्यादि जितने भी अपने स्वजन कहलाते हैं यह सब कछुआ एवं विशाल मछली बनकर मुझे खा रहे हैं। सौभाग्य से यदि कोई सद्गुरु अपनी अकारण-कृपा से स्वयं मल्लाह बनकर जहाज को साथ लिये हुए मुझे पुकारता है, तो वह निज अहंकार वश मुझे मगर के समान दिखाई पड़ता है। कृपालु कहते हैं कि हे नाथ! मेरी पुकार शीघ्र ही सुनो तथा दौड़कर मुझ डूबते हुए को बचाओ क्योंकि तुम्हारा नाम 'कृपालु अर्थात् दया करने वाला है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 215-216