दैन्य-माधुरी · पद 51
द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे!
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dwāra patita ika āyo rī kishorī rādhe!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे!
2मांगत भीख प्रेम की यद्यपि,
3पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे!
4विष्ठा-विषय हेतु नित अब लौं,
5शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे!
6संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो,
7कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे!
8जानि जानि अपराध करत नित,
9नेकहुँ नाहिं लजायो री किशोरी राधे!
10नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा,
11सब ही पाय गँमायो री किशोरी राधे!
12तुम बिनु हेतु कृपालु"कृपालुहिं",
13पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे!
हिन्दी भावार्थ
हे गहवर वन विहारिणी राधे! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में अंतःकरण-शुद्धि-रूप पात्र नहीं लाया है। हे किशोरी जी! अनादि काल से सांसारिक विषय वासना रूपी विष्ठा के लिए अब तक शूकर की भाँति चौरासी-लाख योनियों में भटकता रहा। महापुरुषों के बताये हुए आदेशों को स्वप्न में भी नहीं माना तथा सर्वदा मनमाना ही किया। समझ-बूझ कर भी निरन्तर पापों को करते हुए मुझे कभी जरा भी लज्जा नहीं आयी। मानव-देह, तुम्हारी एवं तुम्हारे जनों की अकारण कृपा इन सब को पाकर भी खो दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम बिना कारण ही कृपा करने वाली हो, फिर मुझ पतित को क्यों भुला दिया।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 214-215