# द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे!

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0202-M04-K051
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 51
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 92–92

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे!  
<a id="line-2"></a>मांगत भीख प्रेम की यद्यपि,  
<a id="line-3"></a>पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे!  
<a id="line-4"></a>विष्ठा-विषय हेतु नित अब लौं,  
<a id="line-5"></a>शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे!  
<a id="line-6"></a>संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो,  
<a id="line-7"></a>कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे!  
<a id="line-8"></a>जानि जानि अपराध करत नित,  
<a id="line-9"></a>नेकहुँ नाहिं लजायो री किशोरी राधे!  
<a id="line-10"></a>नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा,  
<a id="line-11"></a>सब ही पाय गँमायो री किशोरी राधे!  
<a id="line-12"></a>तुम बिनु हेतु कृपालु"कृपालुहिं",  
<a id="line-13"></a>पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे!

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे गहवर वन विहारिणी राधे! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में अंतःकरण-शुद्धि-रूप पात्र नहीं लाया है। हे किशोरी जी! अनादि काल से सांसारिक विषय वासना रूपी विष्ठा के लिए अब तक शूकर की भाँति चौरासी-लाख योनियों में भटकता रहा। महापुरुषों के बताये हुए आदेशों को स्वप्न में भी नहीं माना तथा सर्वदा मनमाना ही किया। समझ-बूझ कर भी निरन्तर पापों को करते हुए मुझे कभी जरा भी लज्जा नहीं आयी। मानव-देह, तुम्हारी एवं तुम्हारे जनों की अकारण कृपा इन सब को पाकर भी खो दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! तुम बिना कारण ही कृपा करने वाली हो, फिर मुझ पतित को क्यों भुला दिया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 214-215

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
