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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 50

दीनानाथ मोहिं काहे बिसारे,

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dīnānātha! mohiṁ kāhe bisāre? hamarihiṁ bāra mauna kasa dhāre?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1दीनानाथ मोहिं काहे बिसारे,

2हमरिहिं बार मौन कस धारे।

3नाथ! अगति के गति अनाथ हम,

4कहहु कौन गति मोरि विचारे।

5गणिका गीध अजामिल आदिक,

6सुनत अमित पतितन तुम प्यारे।

7इन सम अगनित पतित रोम प्रति,

8वारत पतित विरद रखवारे।

9दंभ कोटि शत कालनेमि सम,

10कोटिन रावन सम मद धारे।

11लाजहुँ जासु लजाति अधम अस,

12हैं न हुये न तु ह्वैहैं भारे।

13कौने मुख “कृपालु” प्रभु सन कछु,

14कहिय नाथ अब हाथ तिहारे॥

हिन्दी भावार्थ

हे दीनानाथ! तुमने मुझे क्यों भुला दिया? हमारी ही बार कैसे मौन धारण कर लिया? हे नाथ! हम अनाथ हैं और तुम अगति-के गति हो। बताओ तो सही, तुमने हमारे लिए क्या सोचा है? गणिका (वेश्या), गीध, अजामिल इत्यादि अनंत पापियों से तुमने प्यार किया है, ऐसा सुनता हूँ। किन्तु हे पतितों की रक्षा का भार लेने वाले! पतित-पावन विरद को धारण करने वाले! इन सरीखे तो अनंत पापी मेरे प्रत्येक रोम पर न्यौछावर किये जा सकते हैं। फिर मेरा क्या होगा? सैकड़ों करोड़ कालनेमि के समान मेरे अंदर पाखंड भरा हुआ है, एवं करोड़ों रावण के समान अभिमानी भी हूँ। कहाँ तक कहूँ जिसके पापों को देखकर लज्जा भी लज्जित है। मुझ सरीखा पापी न तो इस समय है, न पहले हुआ था, न तो आगे ही हो सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं इतना बड़ा अपराधी हूँ कि कौन सा मुँह लेकर आपके सामने कुछ कहने का अधिकार रखूँ। हे नाथ! अब आप ही के हाथ में सब कुछ है, चाहे अपनाइए, चाहे ठुकराइए।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 213-214