दैन्य-माधुरी · पद 49
दीन के तुम ही दीनानाथ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dīna ke, tuma hī dīnānātha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दीन के तुम ही दीनानाथ।
2नर किन्नर सुर कोउ देत नहिं, दीन हीन को साथ।
3जब लौं तन धन जन को बल रह, गावत सब गुन गाथ।
4लखतहिं निबल प्रबल स्वारथरत, तजत दंपतिहुं हाथ।
5पुनि उन बाँह गहे न गहे का? तुम बिनु सबै अनाथ।
6अब कृपालु अपनाय"कृपालुहिं"धरहु हाथ मम माथ॥
हिन्दी भावार्थ
हे दीनानाथ श्यामसुन्दर! दीन जनों के एकमात्र तुम्हीं नाथ हो। हे श्यामसुन्दर! मनुष्य, किन्नर, देवता आदि कोई भी असमर्थ का साथ नहीं देता। संसार में जब तक किसी के पास शरीर, सम्पत्ति एवं व्यक्तियों का बल रहता है तब तक सभी लोग उसके गुण गाया करते हैं और जैसे ही वह इन साधनों से रहित हो जाता है, वैसे हो प्रबल स्वार्थी प्राणाधिक प्यार का वादा करने वाले स्त्री पति भी हाथ छोड़ देते हैं। फिर इन मायाधीन रंक साथियों के हाथ पकड़ने से भी क्या लाभ। कृपालु' कहते हैं-हे श्यामसुन्दर! अब 'कृपालु"को अपनाकर कृतार्थ करो, एवं अपना हाथ सदा के लिए मेरे सिर पर रख दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 212-213