दैन्य-माधुरी · पद 48
दीन की सुन लो दीनानाथ।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dīna kī suna lo dīnānātha!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दीन की सुन लो दीनानाथ।
2साधनहीन मलीन छीन हौं, सब विधि नाथ! अनाथ।
3श्रद्धाबल-संबल नहिं नेकहुँ, नहिं संतन को साथ।
4बूड़त हौं भवसिंधु दयामय!, पकरि लेहु अब हाथ।
5सात स्वर्ग अपवर्ग न माँगत, रह तव पद मम माथ।
6दै निज प्रेम कृपालु"कृपालुहिं", करिये नाथ सनाथ॥
हिन्दी भावार्थ
हे दीनों के नाथ श्यामसुन्दर! मुझ दीन को टेर सुन लो। क्योंकि मैं समस्त साधनों से रहित, पापमय एवं दुःखिया हूँ। कहाँ तक कहूँ, हे नाथ! मैं सब प्रकार से अनाथ हूँ। मेरे मिमी श्रद्धा का लवलेश भी बल नहीं एवं महापुरुषों का नित्य साथ भी नहीं। हे दयामय! अब मैं इस अगाध भवसागर में डूब सा ही रहा हूँ। कृपा करके अब शीघ्र ही डूबते हुए को अपने हाथों का सहारा देकर बचा लो। मैं सातों स्वर्ग के सुखों को एवं मोक्ष के सुख को भी नहीं चाहता। मैं तो केवल यही चाहता हूँ कि मेरा सिर सदा आपके युगल-चरणों में पड़ा रहे। कृपालु' कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! अब तुम अपना निष्काम प्रेम मुझे देकर सदा के लिए निष्काम कर दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 211-212