दैन्य-माधुरी · पद 47
दर्शन देना नंद दुलारे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: darshana denā nanda-dulāre! nanda-nandana nainana ke tāre
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दर्शन देना नंद दुलारे।
2नंदनंदन नैनन के तारे।
3मटकनि मोर मुकुट की माथे,
4चटकनि केशर तिलक लिलारे।
5अलकनि-झलक मनहुँ अवलिन अलि,
6जुरि जुरि जात जलज मुख पारे।
7सुधा-पयोनिधि मधि विष-अंबुधि,
8मतवारे चंचल दृग वारे।
9अंबर पीत दिपत दुति दामिनि,
10भृगुपद गुंजमाल गल धारे।
11कटि कमनीय काछनी काछे,
12कर मुरली अँगुरीन सहारे।
13हाय!! कबहुँ झूमत सखि मो ढिग,
14प्रीतम अइहैं प्राणपियारे।
15अब “कृपालु” को बेगि मिलहु पिय,
16नाहित जात ये प्राण हमारे॥
हिन्दी भावार्थ
हे नन्दनन्दन! हे नयनों के तारे, नन्ददुलारे! शीघ्र निम्नलिखित श्रृंगार से युक्त होकर दर्शन दीजिए। तुम्हारे सिर पर मयूर पंख का मुकुट झोके खा रहा है। ललाट पर चन्दन और केशर का तिलक लगा है। घुंघराली अलकें, मानो भौंरों का झुंड इकट्ठा हो-होकर मुख रूपी कमल पर जा रहा हो। तुम्हारी आँखें मतवाली हों, तथा अमृत के समुद्र के (आँख को सफेदी के) बीच में विष का समुद्र (कालिमा) हो-तात्पर्य यह कि तुम्हारी आँखों में अमृत, विष, मदिरा भरी हुई हो और साथ ही चंचल भी हों। बिजली की चमक के सदृश पीताम्बर फहरा रहा हो, हृदय में भृगु महाराज का चरण चिह्न हो। गुंजमाल पहने हो। कमर में सुन्दर काछनी कछी हो। हाथ में अंगुलियों के सहारे मुरली लिए हो। हाय! क्या कभी वह दिन भी आयेगा जब उपर्युक्त शृंगार से युक्त प्राणाधिकप्रिय प्रियतम श्यामसुन्दर, हे सखि! झूमते हुए मेरी ओर आयेंगे। 'कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम!! अब मुझ से शीघ्र ही मिलिए अन्यथा मेरे प्राण निकल जायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 210-211