# नाथ! यह माया कौन बलाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0209-M04-K058
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 58
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 95–95

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>नाथ! यह माया कौन बलाय।  
<a id="line-2"></a>श्रुति कह माया शक्ति तिहारी, जड़ सुभाय पुनि वाय।  
<a id="line-3"></a>तबहुँ नचावति सुर नर मुनि कहँ, यह अचरज दरसाय।  
<a id="line-4"></a>पाय प्रेरणा-शक्ति तिहारी, माया, शक्ति दिखाय।  
<a id="line-5"></a>तुम्हरी शक्ति समक्ष नाथ मम, शक्ति कहा करि पाय।  
<a id="line-6"></a>अब निज शक्ति हिं बरजि"कृपालुहिं", लो कृपालु अपनाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे नाथ! यह माया कौन सी बलाय है। वेद कहता है कि माया तुम्हारी जड़ स्वभाव वाली बहिरंग शक्ति है। जड़ होते हुए भी बड़े-बड़े सुर, नर, मुनियों को भी अपने इशारे पर नचाती है, यही महान् आश्चर्यमय विषय है। संत लोग कहते हैं कि तुम्हारी यह माया शक्ति तुम्हारी ही प्रेरणा-शक्ति पाकर अपनी शक्ति दिखाती है। हे नाथ! तुम्हीं बताओ, तुम्हारी शक्ति के सन्मुख यह शक्ति क्या कर सकती है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे कृपालु अब अपनी शक्ति को रोक लो, एवं मुझे सदा के लिए अपना लो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 219-220

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
