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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 28

कहो हरि! कहाँ रह्यो तव न्याय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kaho hari! kahāṁ rahyo tava nyāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहो हरि! कहाँ रह्यो तव न्याय।

2योगक्षेम शरणागत जन कहँ, वहन करत जनु माय।

3उनके अश्रुबिंदु एकहुँ लखि, बिंदु सहस्त्र बहाय।

4चलत सदा उनके पाछे येहि, आशा पदरज पाय।

5अमित जन्म के कर्म शुभाशुभ, छिन महँ देत नसाय।

6दै निज लोक आपु सँग उन कहँ, तबहूँ नाहिं अघाय।

7करत दासता क्रीतदास बनि, नीच टहल बलि जाय।

8यह “कृपालु” अन्याय दयामय, वेदन न्याय बताय॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हीं बताओ तुम्हारा समदर्शित्व का न्याय कहाँ रहा। शरणागत जीवों के योग-क्षेम को तुम माँ की तरह वहन करते हो। उनका एक भी अश्रुबिन्दु देखकर हजारों अश्रुबिन्दु बहाते हो। उनके पीछे इस आशा से चलते हो कि उनकी चरण-धूलि मिल जाय। उनके अनन्त जन्मों के समस्त पुण्य-पाप को एक क्षण में नष्ट कर देते हो। उनको अपने सहित अपना लोक देकर भी नहीं अघाते। उनके क्रीतदास बनकर अनन्त काल तक दासता करते हो एवं दासता में भी नीचे स्तर की दासता में बलिहार जाते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि यह अन्याय स्वार्थ-सिद्धि के लिए नहीं है, जीव कल्याणार्थ ही है। अतएव इस अन्याय को दया माना जाता है और यह दया वेदों के विधान के अनुकूल है। अतएव जो इस दया का भागी बनना चाहता हो वह श्यामसुन्दर के शरणागत हो जाये।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 195-196