दैन्य-माधुरी · पद 29
कहौं का, तुम सों नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahauṁ kā, tuma soṁ nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कहौं का, तुम सों नंदकुमार।
2वासोँ कहत फबत जो उर की, नहिं जानत सरकार।
3खरे खरे को तो संसारहुँ, सबै निबाहनहार।
4पै मो सम खोटे को तो प्रभु, इक तुम्हरो दरबार।
5यद्यपि क्षमायाचनाहूँ को, नहिं हमरो अधिकार।
6तदपि “कृपालु” कहौं पुनि कासों, को पतितन रखवार॥
हिन्दी भावार्थ
हे नन्दकुमार! तुमसे कुछ कहते शोभा नहीं देता। कहना तो उसी से शोभनीय है जो हृदय की न जानता हो। हे श्यामसुन्दर! अच्छे-अच्छे लोगों को तो संसार में भी सब निबाह लेते हैं, किन्तु मुझ सरीखे खोटे को तो एकमात्र तुम्हारे ही दरबार का सहारा है। यद्यपि मुझे क्षमा माँगने का भी अधिकार नहीं है, क्योंकि क्षमा माँगने का अभिप्राय यह होता है कि पुनः अपराध न करे। 'कृपालु' कहते हैं तथापि फिर और किससे कहूँ, पतितों को अपजाने वाला और कौन है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 196-197