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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 30

कहौं हरि कहा? कौन मुहँ लाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kahauṁ hari kahā? kauna muṁha lāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कहौं हरि कहा? कौन मुहँ लाय।

2तुम सों पाय पतित पावन प्रभु, चरन शरन नहिं आय।

3पढ्यो सुन्यो सब वेद पुरानन, गुन्यो नाहिं इठलाय।

4नित रह लक्ष्य लोकरंजन को, बातन विविध बनाय।

5औरन की झूठी निंदा करि, चाहत रसिक कहाय।

6अबहूँ नाथ! “कृपालु” न चेतत, नर तनु बीत्यो जाय॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुमसे कौन सा मुँह लेकर, क्या कहुँ? तुम सरीखा पतितपावन स्वामी पाकर भी तुम्हारी शरण में नहीं आ सका। वेदों, शास्त्रों एवं पुराणों को भली-भाँति पढ़ा एवं सुना भी, किन्तु अहंकारवश नहीं माना। प्रतिक्षण अनेक प्रकार की रंग-बिरंगी बातों के द्वारा संसार को ही प्रसन्न करने का लक्ष्य रखा। वास्तविक संतों की भी झूठी निंदा करके अपने आपको संत कहलवाने का प्रयल किया। 'कृपालु' कहते हैं यह अमूल्य मनुष्य शरीर समाप्त होता जा रहा है फिर भी चेतना नहीं आ रही है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 197