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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 31

कान्ह! टुक सुन लो करि के कान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha! ṭuka suna lo kari ke kāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1कान्ह! टुक सुन लो करि के कान।

2टेरत टेरत हारि गयों हौं, का नहिं तुम्हरे कान?।

3तुम कहँ सब कह"हरि"पुनि क्यों नहिं, नासत हरि! अज्ञान।

4तुम"गोपाल"कहावत पुनि कत, पाल न इंद्रिन कान्ह।

5कहत"पतितपावन"तोहिं रसिकन, करत पतित सम्मान।

6पुनि कृपालु! अति पतित"कृपालुहिं", कत न दास निज मान॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! थोड़ी सी हमारी पुकार सुन लो। हम पुकारते-पुकारते हार गये फिर भी तुम नहीं सुनते। क्या तुम्हारे कान ही नहीं हैं? तुम्हें सब लोग हरि कहते हैं फिर तुम मेरे अज्ञान को क्यों नहीं हर लेते? तुम्हें सब लोग गोपाल कहते हैं फिर तुम मेरी इन्द्रियों का पालन क्यों नहीं करते? वे विषयों की ओर क्यों जाती हैं? संत लोग तुम्हें पतित-पावन कहते हैं और यह भी कहते हैं कि तुम पतितों का सम्मान करते हो फिर भी दयामय श्यामसुन्दर! अत्यन्त पतित 'कृपालु को अपना दास क्यों नहीं मानते?

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 198