दैन्य-माधुरी · पद 32
कान्ह! तुम नहिं मो कहँ पहिचान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kānha! tuma nahiṁ mo kahaṁ pahichāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कान्ह! तुम नहिं मो कहँ पहिचान।
2ब्रह्म सच्चिदानंद पुत्र हम, चारिहुँ वेद बखान।
3माँगत साधिकार कछु तोसों, नहिं भिक्षुक मोहिं जान।
4पितु सोँ जो संपति सुत मांगत, रहत तहाँ सम्मान।
5पूत कपूत होत जगहूँ महँ, अचरज कौन महान।
6लाज “कृपालु” जात पितु ताते, करहु प्रेम को दान॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर, तुमने शायद मुझको नहीं पहिचाना। मैं सच्चिदानन्द ब्रह्म का पुत्र हूँ। चारों वेद प्रमाण हैं। इसलिए अधिकार सहित तुमसे कुछ माँग रहा हूँ। मुझे भिखारी न समझना। पिता से पुत्र जो सम्पत्ति माँगता है उसमें सम्मान रहता है। पुत्र कुपुत्र संसार में भी होता है यह कोई नयी या आश्चर्यजनक बात नहीं है। 'कृपालु' कहते हैं कि हे श्यामसुन्दर! अब तुम सरीखे पिता की लज्जा जा रही है अतएव अति शीघ्र प्रेम दान कर दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 198-199