दैन्य-माधुरी · पद 33
किशोरी मोरी, अब न लगाओ बार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī morī, aba na lagāo bāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1किशोरी मोरी, अब न लगाओ बार।
2मांगत भीख कृपा की केवल, खड़ो तिहारे द्वार।
3रसिकन-मुख अस सुनी दीन को, आदर येहि दरबार।
4देर होत अंधेर नहीं बस, इहै रह्यो आधार।
5देर भये जनि जानेहु तजिहौं, हौं जड़ हठी गमार।
6कहिहौं नहिं “कृपालु” काहू सों, आ जाइय इक बार॥
हिन्दी भावार्थ
हे अलबेली राधिके! अब देर न करो। मैं तुम्हारे द्वार-पर खड़ा होकर केवल तुम्हारी कृपा की भिक्षा माँग रहा हूँ। महापुरुषों के मुख से सुना है कि तुम्हारे दरबार में दीनों का सदा सम्मान हुआ करता है। फिर भी जो देर हो रही है इसे देर होती है अन्धेर नहीं ', इस लोकोक्ति के अनुसार समझकर विश्वास पूर्वक आशा लगाये बैठा हूँ। किशोरी जी! तुम्हारी कृपा पाने में कितनी ही देर क्यों न हो, पर तुम यह न समझना कि मैं देर होने के कारण तुम्हारा अवलम्ब छोड़ दूँगा। क्योंकि मैं पक्का जड़, हठी एवं मूर्ख हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हे किशोरी जी! चुपके से आप मुझे दर्शन दे जाओ। यदि तुम्हें यह भय हो कि तुम और लोगों से कह दोगे, तो मैं वचन देता हूँ कि मैं किसी से नहीं कहूँगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 199-200