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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 34

किशोरी मोरी, करहु कृपा की कोर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kishorī morī, karahu kṛipā kī kora

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1किशोरी मोरी, करहु कृपा की कोर।

2बहुविधि नाच नचावति स्वामिनि!, यह माया बरजोर।

3काम क्रोध अरु लोभ मोह मद, घेरे चहुँ दिशि चोर।

4जानतहूँ नहिं मानत ठानत, हठहिं हठी मन मोर।

5सुत वित नारि पियारि लगति अति, यदपि कहावत तोर।

6ताते दै निज प्रेम"कृपालुहिं"हेरहु हमरिहुँ ओर॥

हिन्दी भावार्थ

हे किशोरी जी! मुझ पर भी कृपा दृष्टि करो। यह प्रबल माया मुझे अनेक प्रकार के नाच नचा रही है। काम क्रोध, मद, लोभ, मोह ये बड़े-बड़े शत्रु चारों ओर से घेरे हुए हैं। सब कुछ जानते हुए भी यह हठीला मन दुराग्रह के कारण नहीं मानता, संसार की ओर ही जाता है। यद्यपि मैं तुम्हारा कहलाता हूँ फिर भी धन, पुत्र, स्त्री आदि से प्यार करता हूँ। कृपालु' कहते हैं इसलिए एक बार हमारी ओर भी देखकर अपना विशुद्ध प्रेम देकर कृतार्थ करो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 200