# कहो हरि! कहाँ रह्यो तव न्याय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0179-M04-K028
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 28
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 81–81

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कहो हरि! कहाँ रह्यो तव न्याय।  
<a id="line-2"></a>योगक्षेम शरणागत जन कहँ, वहन करत जनु माय।  
<a id="line-3"></a>उनके अश्रुबिंदु एकहुँ लखि, बिंदु सहस्त्र बहाय।  
<a id="line-4"></a>चलत सदा उनके पाछे येहि, आशा पदरज पाय।  
<a id="line-5"></a>अमित जन्म के कर्म शुभाशुभ, छिन महँ देत नसाय।  
<a id="line-6"></a>दै निज लोक आपु सँग उन कहँ, तबहूँ नाहिं अघाय।  
<a id="line-7"></a>करत दासता क्रीतदास बनि, नीच टहल बलि जाय।  
<a id="line-8"></a>यह “कृपालु” अन्याय दयामय, वेदन न्याय बताय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! तुम्हीं बताओ तुम्हारा समदर्शित्व का न्याय कहाँ रहा। शरणागत जीवों के योग-क्षेम को तुम माँ की तरह वहन करते हो। उनका एक भी अश्रुबिन्दु देखकर हजारों अश्रुबिन्दु बहाते हो। उनके पीछे इस आशा से चलते हो कि उनकी चरण-धूलि मिल जाय। उनके अनन्त जन्मों के समस्त पुण्य-पाप को एक क्षण में नष्ट कर देते हो। उनको अपने सहित अपना लोक देकर भी नहीं अघाते। उनके क्रीतदास बनकर अनन्त काल तक दासता करते हो एवं दासता में भी नीचे स्तर की दासता में बलिहार जाते हो। 'कृपालु' कहते हैं कि यह अन्याय स्वार्थ-सिद्धि के लिए नहीं है, जीव कल्याणार्थ ही है। अतएव इस अन्याय को दया माना जाता है और यह दया वेदों के विधान के अनुकूल है। अतएव जो इस दया का भागी बनना चाहता हो वह श्यामसुन्दर के शरणागत हो जाये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 195-196

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
